लैंगिक समानता के बिना मानव अधिकार की परिकल्पना नहीं की जा सकती

  • लैंगिक समानता की दिशा में हाल के वर्षों में अर्जित हमारी उपलब्धि  बढ़ते रूढ़िवाद से खतरे में हैं
  • समानता की सार्वभौमिक रूप से सहमत भाषा भी अब खतरे में है
  • प्रतिगामी शक्तियों से लड़ने के लिए सरकारों को सिविल सोसाइटी के समर्थन से प्रयास करना चाहिए

स्वास्थ्य और विज्ञान पहले की तुलना में काफी उन्नत हुए हैं. लेकिन इसके बावजूद दुनिया के ज्यादातर देश कोविड-19 से उत्पन्न चुनौतिओं से निपटने में अक्षम हैं. विडंबना ये है कि जो डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म हमें एक दूसरे से जोड़ता है, उसी प्लेटफार्म की वज़ह से वास्तविक जीवन में वैमनस्य, यहाँ यहां तक ​​कि घृणा भी, बढ़ गया है. दुनिया में पहले से ज्यादा लोकतंत्र हैं, लेकिन ताजा फ्रीडम हाउस की रिपोर्ट यह भी बताती है कि लोकतंत्र और बहुलवाद (pluralism) पर खतरे भी बढ़ रहे हैं.

इस चुनौतीपूर्ण वैश्विक परिदृश्य में कई मूल्यों का ह्रास हुआ है जैसे कि सच्चाई, करुणा, बुनियादी शालीनता.

मानव अधिकार और लैंगिक समानता को जो नुकसान हो रहा है, उससे हम सभी अवगत हैं ही.

75 साल पहले संयुक्त राष्ट्र की स्थापना के बाद से ही इन दो मुद्दों ने विश्व परिदृश्य को बदलने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. चाहे वो १९४५ का UN चार्टर हो या 1948 के मानव अधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा हो या

1994 में हुए अंतर्राष्ट्रीय जनसंख्या और विकास सम्मेलन का पहला सम्मलेन मिस्र (काहिरा) हो, फिर

बीजिंग में हुए महिलाओं पर चौथा विश्व सम्मेलन हो, मानव अधिकार और लैंगिक समानता के महत्व को सभी अंतर्राष्ट्रीय संधिओं और समझौतों ने रेखांकित किया है. इन सभी की सामूहिक और पूरक दृष्टि 2030 एजेंडा फॉर सस्टेनेबल डेवलपमेंट और इसके सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल्स में शामिल हैं, जिसमें लैगिक समानता भी शामिल है. यह सही है एशिया प्रशांत क्षेत्र सहित वैश्विक स्तर पर हाल के दशकों में कई मोर्चों पर हमने सफलताएँ अर्जित की हैं. मगर दुर्भाग्य से दुनिया भर में बढ़ते रूढ़िवाद ने ICPD, बीजिंग प्लेटफ़ॉर्म और SDG को सफल बनाने के प्रयासों को आघात पहुंचाया है. स्वास्थ्य और प्रजनन अधिकारों से संबंधित वो सभी परिकल्पनाएं जो संयुक्त राष्ट्र और अन्य वैश्विक दस्तावेज़ों में की गई है, जिसकी चर्चा ICPD में भी है, और जिस दिशा में लगातार प्रयास भी हुए हैं को बढ़ते हुए रुढ़िवाद की वज़ह से खतरा उत्पन्न हुआ है. इस वज़ह से महिलाओं के स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दों पर हम आगे बढ़ने के बजाय पीछे हो रहे हैं.खासकर वो देश जहाँ संसाधनों की कमी है, वहां महिलाओं के सवास्थ्य से जुड़े मुद्दों पर प्रयास करने के बजाय तमाम अन्य गैर जरुरी मुद्दों पर ध्यान दिया जाना ज्यादा जरुरी समझा जा रहा है.

लैंगिक समानता की मूल अवधारणा खतरे में है. पितृसत्ता, महिलाओं के खिलाफ हानिकारक प्प्रथाएं और लिंगभेद करने वाली संस्थाएं और मजबूत हुई है. जो संस्थाएं महिलाओं के अधिकारों पर हमले कर रही हैं उनके निशाने पर विविध यौन पहचान के व्यक्तियों के अधिकारों और उनके हितों,शारीरिक रूप से अक्षम लोग, पहले से ही हाशिए पर रहे समूह भी शामिल हैं.

हम इस सब का मुकाबला कैसे करेंगे?

हमें ऐसी सरकारों की जरुरत है जो सही नेतृत्व दे सकने में सक्षम हो. और जिसके द्वारा किए कार्यों का मूल्यांकन ICPD, बीजिंग प्लेटफार्म, और SDGsकि दिशा में हुए तरक्की से किया जा सके.

नवंबर 2019 में हुए ICPD25 नैरोबी शिखर सम्मेलन में, 145 देशों ने जिसमें एशिया और प्रशांत क्षेत्र के 26 देश भी शामिल थे, प्रोग्राम ऑफ़ एक्शन के प्रतिप्रतिबद्धताएं व्यक्त की थी. ये देश इस बात पर सहमत  थे कि ये एक्शन एसडीजी का एक अभिन्न अंग है. लेकिन यह सिर्फ एक शुरुआत है.

हमें सिविल सोसाइटी और समूहों को सशक्त बनाने की जरुरत है ताकि वो महिलाओं और लड़किओं को सक्षम और मजबूत करने के लिए वो पहल कर सकें जिसकी जरुरत है. उदाहरण के लिए, हम #MeToo आंदोलन को देख सकते हैं. नागरिक अधिकार संगठनों के प्रयासों की बदौलत इस आन्दोलन ने दुनिया भर में गति पकड़ी. लेकिन, अभी भी महिलाओं की बहुत सारी आवाज़ों को खामोश कर दिया जा रहा है.

हमें उन लोगों का एक गठबंधन बनाने की जरूरत है जिसमें एक तरफ वो लोग, देश या समूह शामिल हो जो लैंगिक समानता के क्षेत्र में आगे हैं और वो लोग, देश या समूह जिन्हें इस दिशा में काफी काम करना है. इन्टरनेट का उपयोग लोगों को जोड़ने, न कि समाज में विभाजन पैदा करने के लिए किया जाना चाहिए.

हमें महिलाओं के अधिकारों और लिंग समानता पर वैसे आंकड़ों की जरुरत है जिससे हम जान पायें कि कहाँ आवश्यकताएं ज्यादा हैं ताकि समावेशी विकास किया जा सके.

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